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Sharad Joshi Satire Idhar ek mahapurush hona

आज की राजनीति पर शरद जोशी का यह व्यंग्य सटीक बैठता है, 'इधर एक महापुरुष होना'

यह लेख 1985 में प्रकाशित उनकी किताब यथासम्भव से लिया गया है, जिसका प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा हुआ था। 

बहुत दिनों से इस देश में कोई महापुरुष कम्बख्त पैदा नहीं हुआ। अब तक हो जाना चाहिए था। इस देश की आबोहवा और मिटटी ऐसी है कि इधर इफरात से महापुरुष पाया जाता है। कौन-सा आदमी कब महापुरुष हो जाए और किधर से पता लगे कि वहां हो गया, कह नहीं सकते। मगर किसी को होना जरूर। अपने देश को एक महापुरुष होना। अवश्य करके होना। लगता है। इस मुल्क की पब्लिक को एक महापुरुष लगता है और एक बार में अगर आधा दर्जन तक महापुरुष भी हो गया ना, तो चलेगा। देश में खप जाएगा, क्योंकि कसकर डिमांड है। यहां की पब्लिक महापुरुष मांगती है की लाओ। पचास करोड़ के देश में दस करोड़ पीछे एक महापुरुष भी हो गया, तो काफी। पर इधर कोई पैदा नहीं हो रहा। मैंने सोचा कई बार, बन जाएं महापुरुष, मगर यह धंधा अपने को साधता नहीं। बड़ा 'मोबिलिटी' लगता है, आज इधर, कल उधर। फोकट में टप्पा मारो। फिर यहां ऐसा कि महापुरुष यानी लुकमान हकीम की दवा। जो हो तो पब्लिक पूछती है कि बताओ अब तुम्हारा क्या कहना पड़ता है। ज्यादा देर खामोश नहीं रख सकती। बड़ा माथा खरच होता है। फिर पब्लिक का मांग है कि ऊंची बात बोलो ।

अब रोज-रोज कहां से ऊंची बात बोलो। मगर यह भी कहूंगा, माफ करना कि एक बार अगर इंसान महापुरुष हो जाए ना, धूल में लट्ठ लगने की बात है, तो फिर बड़ा मजा है। तर माल खाने को मिलता है और बड़ी-बड़ी इम्पाला वाली बाई लोग चरण छूती हैं। है ना मजा! मगर रौब होना! महापुरुष बनेंगा, तो रौब होना। दिल पर थोड़ा कण्ट्रोल मांगता। अपन को ये बात जरा मुश्किल है। इस वास्ते मैं बोला न कि मैं महापुरुष हो नहीं सकता। करके ही तो बोला।

आजादी आ गया, मगर किस्मत का बात देखो। उधर अंग्रेज का बखत में इधर मुलक में कितना महापुरुष पैदा हो गया था। साला जिधर देखो, उधर महापुरुष। आजादी आ गया, तो सोचा, अब देश में खूब महापुरुष लोग जनम लेगा। मगर नया तो आया नहीं और पहले का भी खुट गया। इधर जनता बोलती, महापुरुष मांगता, फोक नेता से काम नहीं चलेगा। डालडा नहीं मांगता, असल वाला दिखाओ, जो ऊंची बात बोले। नेता लोग बोला, हम महापुरुष हैं, हम महापुरुष हैं, मगर पब्लिक ने साफ बोला, नो-नो, इधर खालिस चाहिए। चप्पल फेंकेगा, अंडा फेंकेगा। मगर अब करे क्या साब, हो महापुरुष, तो हाजिर करे, नहीं हो तो कहां से लाये। ब्लैक में भी नहीं मिलता।

एक बात तो मैं बताऊंगा साहब कि इस मुलक को जो भी महापुरुष होना, कंट्री होना, पक्का देसी, धोतीबाज। इधर बुश्शर्ट-पेंटवाला महापुरुष चलेगाच् नहीं। पब्लिक को अपनी तरफ खींचना मांगता। लिबास कपड़ा को सादा हो ना, तो पब्लिक बोलता है आदमी, फकीर तबीयत का अपना वाला है, धोखा नहीं देगा। रुपया वाला लोग भी खिंचता है कि इसको रुपया-पैसा देने में नुकसान नहीं, क्योंकि खायेंगा नहीं। थोड़ा-बहुत खाएगा भी, तो नुकसान नहीं, क्योंकि ऐसा कि महापुरुष से बड़ा फायदा रहता है। एक बात बोलूं कि महापुरुष होने से अपर-क्लास को, हाई-क्लास को बड़ा फायदा रहता है। अब जैसे मजदूर लोगों ने हड़ताल किया, तो लोग परेशान। अब ऐसे बखत पर अगर कोई महापुरुष होगा, तो क्या बोलेंगा? बोलेंगा कि भाई लोग जरा शांति से रहो और प्रेम रखो। ये आपस में लड़ाई-झगड़ा बेकार का बात है। त्याग करो, खुश रहो। कर्म करो। वो क्या बोलते हैं, कर्मण्डेयवाधिकारस्ते, जाने क्या बोलते रे। तो कर्म करो और धन का लोभ मत करो। जिंदगी चार दिन का मेला, अरे मर जाएगा कल, ईश्वर का नाम ले तू, हड़तालबाजी में क्या पड़ा है। बड़ा मजा है। फिर जो असली महापुरुष होइंगा ना, तो लगे हाथ चार गाली! रुपयावाले को भी ठोंक देगा। तुम शोषक, देश का दुश्मन, हवेली तानकर बैठा है, गरीब पब्लिक का ध्यान नहीं देता। ऐसा बोलेंगा। रुपयावाले को भी बोलेंगा। मगर माइंड नहीं करेंगा। महापुरुष का बात कोई माइंड नहीं करता साब, यही तो मजा है।

महापुरुष लोग बोलते क्या, कि सच बोलो और प्रेम रखो। अब आप सोचिये कि जो सच-सच बोल दिया ना, तो प्रेम कैसे होगा। अरे प्रेम जो करना है, तो थोड़ा-बहुत झूठ बोलना ही पड़ेगा। अपनी लुगाई को बोल दो कि तेरी शकल खराब है। आपने जो सच बात थी, सो बोल दी। अब क्या उससे प्रेम हो सकता क्या? हाथ नहीं धरने देगी साब। महापुरुष बोलता कि सच बोलो और प्रेम रखो। आप सोचो। ऐसा हो सकता क्या?

मगर जो आम जनता है, उसके वास्ते महापुरुष जो बोले, सो पत्थर की लकीर। वो कुछ भी बोले। थोड़ा पागल जैसा बोल जाए ना, तो लोग कहेंगे बहुत ऊंचा इंसान है। अब होना तो कुछ है नहीं। सिर्फ जुबान का खेल है, मगर आत्मा को शांति होता है। सारा देश का आत्मा को शांति होता है। फिर आप फॉरेन में रॉब जमाओ। सारा दुनिया सोचेगा, क्या ग्रेट कंट्री है, जहां ऐसा लोग हर पांच-दस साल में पैदा हो जाता है। उधर विदेश के मुल्क में तो सौ साल में जो एक भी महापुरुष हो जाए ना, तो किस्मत समझो। वो लोग तो बिना महापुरुष के चला लेता है काम, मगर अपने लोग को तो एक हमेशा होना, महापुरुष मर भी जाए ना तो कोई नुकसान नहीं। उसका नाम लेकर काम चल जाता है। गाय का चमड़ा बाद में भी जूता बना के कम आता है। वैसा ही महापुरुष का किस्सा। बाद में नाम भी धकता है। बच्चा लोग के कोर्स में लग जाता है। 

पर कोई होना। एक महापुरुष देश में बोर करने को होना। ये सारा धांधलेबाजी खतम हो जाएगा। मगर अब लाएं कहां से। अपन की तो सधता नहीं। नहीं अपन साला हो जाता। 
   

  
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Synopsis
यह लेख 1985 में प्रकाशित उनकी किताब यथासम्भव से लिया गया है, जिसका प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा हुआ था।