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आइए... इन ग़ुमनाम शहीदों को भी कर लें एक बार सलाम!

आइए... इन ग़ुमनाम शहीदों को भी कर लें एक बार सलाम!

लोगों को सिर्फ़ महल की खूबसूरती, उसके शानदार छज्जे और सिर्फ़ डिज़ाइन दिखाई देता है, लेकिन जिन नींव के पत्थरों पर वो मकान टिका हुआ हैं वो किसी को नहीं दिखाई देते। सब शानदार छज्जे और बाहरी दिखावा बनना चाहते हैं, कोई बिरला ही होता है जो नींव का पत्थर बनता है। हिन्दुस्तान के क्रान्तिकारी उलट थे, वो सब नींव के पत्थर ही बनना चाहते थे। जानिए कुछ ऐसे ही क्रान्तिकारियों के बारे में जो गुमनामी में खो गए।

दुर्गा भाभीDurga-Bhabhi

दुर्गा भाभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों की प्रमुख सहयोगी थीं। 19 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह ने इन्हीं दुर्गा भाभी के साथ वेश बदल कर कलकत्ता-मेल से यात्रा की थी। दुर्गाभाभी क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की धर्मपत्नी थीं।

बटुकेश्वर दत्तbatukeshwar

बटुकेश्वर दत्त (18 नवंबर 1910 - 20 जुलाई 1965) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। बटुकेश्वर दत्त को देश ने सबसे पहले 8 अप्रैल 1929 को जाना, जब वे भगत सिंह के साथ केंद्रीय विधान सभा में बम विस्फोट के बाद गिरफ्तार किए गए। उन्होनें आगरा में स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने में उल्लेखनीय कार्य किया था।

बसन्त कुमार बिस्वासbasan-kumar

युवा क्रांतिकारी व देशप्रेमी श्री बसंत कुमार बिस्वास (6 फ़रवरी 1895 - 11 मई 1915) बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारी संगठन "युगांतर" के सदस्य थे। उन्होंने अपनी जान पर खेल कर वायसराय लोर्ड होर्डिंग पर बम फेंका था और इसके फलस्वरूप उन्होंने 20 वर्ष की अल्पायु में ही देश पर अपनी जान न्योछावर कर दी।

विष्णु गणेश पिंगलेvishnu-kumar-pingle

विष्णु गणेश पिंगले (2 जनवरी 1888-17 नवम्बर 1915) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक क्रान्तिकारी थे। वे गदर पार्टी के सदस्य थे। लाहौर षडयंत्र केस और हिन्दू-जर्मन षडयंत्र में उनको सन् 1915 को फांसी की सज़ा दी गयी।

वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय उपाख्यvrendra-nath-chtopa

वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय उपाख्य 'चट्टो' (1880 — 2 सितम्बर 1937, मास्को) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने सशस्त्र कार्यवाही करके अंग्रेज़ी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया। इन्होंने अधिकांश कार्य विदेशों में रहकर किया। आज़ाद हिन्द फौज की नींव डालने में इनका महत्वपूर्ण हाथ है।

सरदार अजीत सिंहsardar-ajit-sing

सरदार अजीत सिंह सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। लाला लाजपत राय जी के साथ ही साथ उन्हें भी देश निकाले का दण्ड दिया गया था। इनके बारे में कभी श्री बाल गंगाधर तिलक ने कहा था " ये स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनने योग्य हैं "। उन्हें क्या पता था कि आज़ादी के साथ विभाजन की त्रासदी आयेगी जिससे पीड़ित होकर यह व्यक्ति दुनिया से विदाई ले लेगा।

सूर्य सेनsurya-sen

सूर्य सेन (1894 - 12 जनवरी 1934) भारत की स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। उन्होंने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना की और चटगांव विद्रोह का सफल नेतृत्व किया। वे नेशनल हाईस्कूल में सीनियर ग्रेजुएट शिक्षक के रूप में कार्यरत थे और लोग प्यार से उन्हें "मास्टर दा" कहकर सम्बोधित करते थे।

चाफेकर बंधुchafe-kar

दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर तथा वासुदेव हरि चाफेकर को संयुक्त रूप से चाफेकर बंधु कहते हैं। ये तीनों भाई लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के सम्पर्क में थे। तीनों भाई तिलक जी को गुरुवत् सम्मान देते थे। पुणे के तत्कालीन जिलाधिकारी वाल्टर चार्ल्स रैण्ड ने प्लेग समिति के प्रमुख के रूप में पुणे में भारतीयों पर बहुत अत्याचार किए। इसकी बालगंगाधर तिलक एवं आगरकर जी ने भारी आलोचना की जिससे उन्हें जेल में डाल दिया गया। दामोदर हरि चाफेकर ने 22 जून 1897 को रैण्ड की गोली मारकर हत्या कर दी।

पं॰ गेंदालाल दीक्षितpandit-gendala

पं॰ गेंदालाल दीक्षित (?November 30, 1888, December 21, 1920) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अप्रतिम योद्धा, महान क्रान्तिकारी व उत्कट राष्ट्रभक्त थे जिन्होंने आम आदमी की बात तो दूर, डाकुओं तक को संगठित करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खड़ा करने का दुस्साहस किया।

भाई बालमुकुन्दbalmukund

भाई बालमुकुन्द  भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे। सन 1912 में दिल्ली के चांदनी चौक में हुए लॉर्ड हार्डिग बम कांड में मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकुंद और मास्टर अवध बिहारी को 8 मई 1915 को ही फांसी पर लटका दिया गया, जबकि अगले दिन यानी 9 मई को अंबाला में वसंत कुमार विश्वास को फांसी दी गई। वे महान क्रान्तिकारी भाई परमानन्द के चचेरे भाई थे।
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