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तनहाइयों का सफ़र

तनहाइयों का सफ़र

एक

फोन पर उसकी आवाज सुनकर रचना को एक पल के लिए यकीन ही नहीं हुआ कि यह रजत है। आखिर कॉलेज छोड़े हुए आठ साल बीत गए। "उस दिन शरत मुझे मिल गया... उसने तुम्हारा नंबर दिया था।" उस तरफ से रजत की आवाज आई। "दरअसल मैं कंपनी के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में पूना शिफ्ट हो रहा हूं। शरत ने बताया कि आजकल तुम भी पूना में ही रहती हो, तो सोचा तुमसे मुलाकात करते हैं।"

"हां, मैं एक एडवर्टाइजिंग एजेंसी में क्रिएटिव हेड हूं... और तुम?" "अपना तो यार वही घिसा-पिटी सेल्स की नौकरी चल रही है। बस यह है कि अच्छी मल्टीनेशनल कंपनी मिल गई है।" "तुम कब आ रहे हो?" रचना ने पूछा।

रचना की आंखों के आगे कॉलेज के दिन कौंध गए। रजत उनके ग्रुप का सबसे स्मार्ट लड़का था। उसके चलने के अंदाज और मुस्कान पर लड़कियां फिदा थीं। हर रविवार वह पूरे दिन क्रिकेट खेलता था। वह चलता भी ऐसे था जैसे क्रिकेट की पिच पर हो। उन्हीं दिनों रचना के पापा की डेथ हो गई। वे पिछले दो सालों से बहुत बीमार थे। रचना सिर्फ फाइनल परीक्षाएं देने कॉलेज आ पाई थी। उसके बाद किसी से मुलाकात नहीं हुई। कोई कहीं निकल गया... कोई कहीं।

दो

"पूना कितना शांत शहर है न? कोलकाता की भीड़भाड़ से आकर यहां पर बहुत सुकून सा मिलता है।" रचना चुपचाप रजत के साथ-साथ चलती रही। सूरज अभी डूबा था और पश्चिम का आकाश सिंदूरी हो गया था। कई साल पहले फेयरवेल प्रोग्राम के बाद कॉलेज की छत पर सब इकट्ठा हुए तो क्षितिज पर ऐसी ही सिंदूरी आभा फैली थी। निशा, मोहित, तनु, अमन सब मूड में थे। मजाक पर मजाक चल रहे थे। रजत अभी नहीं आया था, सब उसका इंतजार कर रहे थे... तभी तनु को एक शरारत सूझी... "अरे! रजत आ गया..." "कहां?" रचना पलटी। सभी ठहाका लगाकर हंस पड़े। रचना झेंप गई... फिर तो एक सिलसिला सा चल गया छेड़ने का। मगर बात छेड़छाड़ से आगे नहीं बढ़ सकी। निगाहों से ओझल होते ही रजत उसे जैसे भूल जाता था। "क्या सोच रही हो तुम?" रजत ने पूछा। "कुछ नहीं कॉलेज के दिन याद आ गए। बाकी लोगों से मुलाकात होती है क्या? ...और वह हमारी स्मार्टी निशा कहां है आजकल?"

"मुझे भूख लगी है... चलो आसपास किसी अच्छे रेस्टोरेंट में चलते हैं।" सड़क पार करते हुए रजत ने रचना का हाथ थाम लिया। निशा फिर आठ साल पहले चली गई।

"तुम्हारा हाथ बड़ा ही कांप्लीकेटेड है..." रजत ने उसकी हथेली को सीधा करते हुए कहा, "रिलेशनशिप बनेगी और टूटेगी...।"

"अरे तुम फिर कहां खो गई रचना?" "याद है रजत तुमने फेयरवेल वाले दिन मेरा हाथ देखा था। तुम्हें सचमुच में एस्ट्रोलॉजी आती है या फर्जी है सब?" "अरे यार, तब मेरे अंकल ने मुझे बहुत सिखाया था।" "...पर तुमने मुझसे कहा था कि अगले कुछ महीनों में शायद एक बुरी खबर सुनने को मिले... और वही हुआ मेरे पापा नहीं रहे।" "आइ एम सॉरी... यार!" "कोई बात नहीं।"

पूना का मौसम अचानक बेहद सुहावना हो उठा। हर शाम वे मिलते... अतीत दोनों के बीच शुरुआती बातों का सिलसिला बना और देखते-देखते भविष्य ने उसकी जगह ले ली। रचना ने बताया कि कैसे पापा की मौत के बाद उसने आठ साल कड़ी मेहनत के बाद यह मुकाम बनाया। आज विज्ञापन की दुनिया में बतौर कॉपीराइटर उसकी एक पहचान है। उसने रजत को अपने पापा की लिखी कविताओं की कुछ पंक्तियां सुनाईं।

"आज मैं पलटकर देखती हूं तो मुझे गर्व होता है कि मैं अपने पापा की बेटी हूं।" रचना ने कहा। उस शाम रचना ने रजत को अपने फ्लैट पर खाने के लिए बुलाया था, "...लेकिन रजत मैंने इन आठ सालों में इस प्रोफेशनल एचीवमेंट के बदले बहुत कुछ खोया भी है। वो चुपचुप रहने वाली शर्मीली रचना आज बेहद कान्फीडेंट है मगर कोई ऐसा नहीं है जिस पर आंखें बंद करके थोड़ी देर भरोसा कर लूं।"

वह चुप हो गई। देर से भरी आंखों से दो बूंदें ढलक गईं। रजत ने अपनी उंगलियों से उसकी आंखों के कोरों को पोंछ दिया। रजत का स्पर्श पाते ही रचना मानो पिघलने सी लगी। वह रजत के सीने से जा लगी। रचना को लगा उसे रजत के करीब और करीब जाना चाहिए और वह रजत में समाती गई।

रजत को पूना में रहते हुए कब डेढ़ महीने बीत गए पता ही नहीं चला।

एक दिन अचानक ऑफिस से रजत का फोन आया। "हैलो, रचना..." उस तरफ से रजत की आवाज आई, "यार मुझे वापस कोलकाता जाना पड़ेगा। आज शाम की ही फ्लाइट से... कंपनी कहा है अभी यह प्रोजेक्ट छोड़कर आ जाओ। यहां शायद किसी और को भेज रहे हैं। क्या करें यार ये सेल्स का काम है ही ऐसा। नहीं यार... मिल नहीं सकूंगा। पर पहुंचते ही फोन करता हूं तुम्हें! सी यू।"

तीन

"मैं इस सूने शहर में कितनी अकेली और उदास थी।" रजत के जाने के बाद रचना अपनी डायरी लिख रही थी। "...और रजत तब तुम मेरी जिंदगी में आए। उस सारी खुशियों के साथ जिन्हें मैं आठ साल पहले भोपाल में छोड़ आई थी। मुझे लगा कि मैं तब भी तुम्हें चाहती थी और आज भी उतना ही प्यार करती हूं। पर डरती थी कि कहीं तुम... पर उस रात जब मैं तुम्हारे करीब आई तो लगा कि अरे यह पहले क्यों नहीं हुआ। मैं शब्दों में कहे जाने का इंतजार क्यों करती रही... सच, उसके बाद के हफ्तों में तो मैं जैसे तुम्हारे साथ पंख लगाकर उड़ती रही। रजत... तुम कब वापस आओगे। पहले भी मैं तुम्हारा इंजार करती थी, पर यह बात मुझे पता नहीं थी... अब मैं सचमुच तुम्हारा इंतजार कर रही हूं।"

दिन बीतते गए... रचना अपने नए प्रोजेक्ट में बिजी हो गई। एक दिन कॉफी हाउस के पास से गुजरते हुए उसे रजत का ख्याल आया। उसने नंबर मिलाया तो उधर से आवाज आई, 'दिस नंबर इज नॉट वैलिड'। घर लौटकर उसने फेसबुक पर रजत का नाम डाला मगर रजत नाम के इतने लोग नजर आ रहे थे कि उसमें से रजत को तलाशना मुश्किल लग रहा था। अचानक उसे अपने कॉलेज का एक ग्रुप नजर आया और ग्रुप में उसे निशा दिख गई।

निशा पाठक अब एक मल्टीमेशनल कंपनी में सीनियर एचआर मैनेजर है। वह कालेज की सबसे कॅरियर ओरिएंटेड लड़की थी। वह उसके प्रोफाइल पेज को देखती रही। अचानक एक तस्वीर में वह रजत के साथ दिखी। वह उसके अलबम में गई तो देखा और भी तस्वीरें थीं। सगाई, थाईलैंड में हनीमून और पार्टी की तस्वीरें... हर तस्वीर में रजत नजर आ रहा था। रचना एक के बाद एक तस्वीरें देखती रही। उसे लगा किसी ने उसे जोरदार थप्पड़ मारा है। रचना को अपने-आप पर क्रोध आ रहा था। उस रात वह अपने पापा की फोटो पकड़कर रोती रही और जाने कब सो गई।

चार

रचना का फोन बजा। "हैलो, रचना... मैं रजत बोल रहा हूं। तुमने निशा से बात की है क्या? वह मुझसे बात नहीं कर रही है। उसने तुम्हारा नंबर मुझे थमा दिया और बिना कुछ बताये घर से चली गई है।"

"रजत मेरा इरादा तुम्हारी गृहस्थी में आग लगाने का नहीं था।" रचना ने शांत आवाज में कहा, "मगर सारी जिंदगी तुम दूसरों के इमोशन के साथ नहीं खेल सकते। यह आजादी तो किसी को नहीं होनी चाहिए। जब मैं एक मामूली सी लड़की थी लेकिन तुम्हें प्यार करती थी तो तुमने मेरी जगह निशा को चुना, चलो कोई बात नहीं। लेकिन जब मैं खुद को एक मुकाम तक लेकर आई तो तुमने मेरा इमोशनल और शारीरिक इस्तेमाल किया। रजत तुमने मुझे तो धोखा दिया और मैंने तुम्हें माफ कर दिया। मगर मैं नहीं चाहती थी कि निशा सारी जिंदगी धोखा खाती रहे... बाकी उसका फैसला...।"

"रचना... तुम जानती हो मैं..." रजत ने कुछ कहना चाहा मगर रचना ने फोन काटकर स्विचऑफ कर दिया।

उसने अपनी पुरानी डायरी उठाई और उसमें अपने पापा की लिखी कविता पढ़ने लगी।

यह कहानी हमें भेजी है शालिनी ने। वे मूक-बधिर बच्चों की टीचर रह चुकी हैं और अब अपना खुद का काम करती हैं। आपके पास है ऐसी कोई दिल को छूने वाली प्रेम कहानी तो हमें इस पते पर भेजें [email protected]

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