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sharad joshi satire speech in loving memory of d

नेताओं के भाषणों की पोल खोलता है शरद जोशी का यह व्यंग्य

कुछ विषय हैं जिन पर आसानी से बोला जा सकता है, जैसे हमारी शिक्षा-प्रणाली पर या भारतीय संस्कृति पर। शहरों में बोलनेवाले होते हैं, जो आकर बोल जाते हैं। जैसे बैंडवालों से कहो कि आकर बैंड बजा जाना तो वे लोग आकर बजा जाते हैं, बशर्ते उन्हें उसी समय कहीं और जाकर न बजाना हो। पर देश में अधिकतर भाषण मरे हुए महापुरुषों पर होते हैं। अक्सर कोई मरा करता है या ऐसा दिन आया करता है जब किसी मरे की याद की जाए।

भारतीय लोग मुर्दा जलाने की कला में सिद्ध होते हैं। वे भाषण दे-देकर मुर्दे को खड़ा कर देते हैं और वह श्रोताओं के सिर पर मंडराने लगता है। यादों में नहाकर इस देश के श्रोता जब घर लौटते हैं तब ज्ञान से तरबतर होते हैं। अपनी भावुकता में खुद जुगाली करने से बढ़कर तृप्ति का बोध और कुछ नहीं। 

याद करने लायक महापुरुष काफी सारे पड़े हैं। राम, कृष्ण, हनुमान, गणेश के जमाने से आगे बढ़ो, तो बुद्ध, महावीर पर अटको, कालिदास को याद करने का सालाना रिवाज है। तुलसी, सूर दो दिन खा लेते हैं। इतिहास में कूदो, तो शिवाजी, प्रताप से लेकर अठारह सौ सत्तावन के आसपास बड़ी संख्या है। 

लक्ष्मीबाई, तांत्याटोपे पर सभा नहीं हुई, तो यह नुगरापन किसी को बर्दाश्त नहीं होगा। फिर अरविंद, रामकृष्ण, दयानंद, विवेकानंद और नानक, कबीर, रैदास के श्रोताओं की सुनिश्चित भीड़ होती है। उसके बाद कांग्रेसी महापुरुष यानि गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, शास्त्री आदि। 

साहित्यिकों की सभा के लिए रवींद्र, भारतेंदु, प्रेमचंद, गालिब वगैरह। (मुझे वे अनेक मृत आत्माएं क्षमा करें जिनका नाम मैं स्मृति की कमजोरी और स्थानाभाव से नहीं ले पा रहा।)

इसके अलावा कई शोक-सभाएं होती हैं। वे लोग जो नियमित रूप से महापुरुषों पर बोलने के लिए निमंत्रित किए जाते हैं, बड़े परेशान रहते हैं। कभी सावरकर, आंबेडकर पर सोचते हैं, तो कभी केनेडी या गोर्की पर।  आगे पढ़ें

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Synopsis
भारतीय लोग मुर्दा जलाने की कला में सिद्ध होते हैं। वे भाषण दे-देकर मुर्दे को खड़ा कर देते हैं और वह श्रोताओं के सिर पर मंडराने लगता है।

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