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हैप्पी बर्थडे इरफ़ान खान: रणविजय सिंह, जिससे मिले बिना इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म नहीं होती!

'दरिया भी मैं, दरख़्त भी मैं...झेलम भी मैं, चिनार भी मैं...देर भी हूं, हराम भी हूं...शिया भी हूं, सुन्नी भी हूं, मैं हूं पंडित...मैं था, मैं हूं और मैं ही रहूंगा...'
-रूहदार
 

आज से करीब दो साल पहले। अक्टूबर का महीना। सूरज अब दक्षिणायन होने की तैयारी में थे। मौसम करवट लेने को तैयार। फिज़ा अब धुंधली होने को थी। सर्दियों का मौसम आ रहा था। जगह मुखर्जीनगर। बत्रा सिनेमा। सिनेमा हॉल में भुचंड अंधेरा। इंटरवल खत्म हुआ ही था। सिनेमा हॉल का धुंधला पर्दा। धीरे-धीरे साफ़ हो रहा था। पर्दे पर एकदम सफ़ेद झक्क बर्फ़ में से निकलता है। एक आदमी। सफ़ेद लिबास में लिपटा। लंगड़ा आदमी। सिर पर काली टोपी। पैरों में जूते और आंखों पर काला चश्मा। रूहदार! शक्ल सामने आते ही सिनेमा हॉल की ख़ामोशी झन-झना गई! 

'आप जिस्म हैं, मैं रूह...आप फानी हैं, मैं लफ्फानी!'- रूहदार!



 

और इसी वक़्त हैदर मेरे लिए रूहदार की फिल्म हो गई। जमाने के लिए होगी ये विशाल भारद्वाज की फिल्म। शाहीद कपूर की फिल्म। लेकिन मेरे लिए ये फिल्म रूहदार की फिल्म थी। जिसका नशा जाते-जाते भी नहीं उतरा।

इरफ़ान खान। राजस्थानी डिगरा! टोंक में पला बढ़ा। बाद में बचपन जयपुर में बीता। रेडियो में नाटक सुन कर कहानियों और एक्टिंग से आशिकी हुई। घने घुंघराले बालों वाला लड़का। जिसे लोग कहते देख तेरी शक्ल मिथुन जैसी लगती है। तो सैलून में जा कर अपने बाल सीधे करवा लेता।  एक सिनेमा देखने के बाद किसी से पूछा ये साधू की एक्टिंग करने वाला कौन था। ये सच्चा साधू था क्या? फिर इसे पता चला। दिल्ली में एक जगह है जो ऐसी एक्टिंग सिखा देता है। एनएसडी। कहता है एनएसडी मेरे लिए किसी जादुई जगह के जैसी बताई गई थी। जहां एक्टिंग जादू से सिखा दी जाती है। और बस चढ़ गया नशा! एनएसडी जाने का। कोशिश की। मिल गया मौका। घुस गया। 

सालों स्ट्रगल किया। टीवी में, सीरियल में। छोटे-छोटे रोल मिले। कहीं विलेन तो कहीं मामूली किरदार। मीरा नायर की सलाम बॉम्बे में काम मिला। लेकिन बाद में फाइनल फिल्म जब आई तो उसमें से भी सीन काट लिए गए। खत लिखने का काम था। साल था 1988। लेकिन इसे कहां मानना था। लगा रहा। कभी अजित, कभी अल्फ्रेड, कभी राहुल तो कभी डॉ. सेन। तो कभी जग्गू बना। 


 

साला आया 2001। सदी बदल गई थी। किस्मत कैसे नहीं बदलती। मेहनत किया था। सालों। पसीने बहाए थे। फिल्म आई 'दी वॉरियर'। दुनिया ने देखा। एक नशीली बड़ी आंखों वाला एक्टर। जो बोलता कम है आंखों से ज्यादा बातें करता है। भर्राए गले से गर कुछ बोल दे तो गोया डायलॉग को मंजिल नसीब हो जाती। करवट बदलने का वक़्त था। 2003। रणविजय सिंह। हासिल। तिग्मांशु धूलिया की फिल्म। जो फिल्में बनाता नहीं है। उन्हें गढ़ता है। हासिल ऐसी ही एक फिल्म। ठेठ इलाहाबादी कॉलेज पॉलिटिक्स पर बनी फिल्म। जिसके लोकेशन, चलने, बुलने के तेवर तक में इलाहाबाद कूट-कूट कर भरा हुआ था।

रणविजय सिंह 


 

और यहां टकराते हैं, गौरी शंकर पांडे और रणविजय सिंह। रणविजय सिंह जिसे पंडितों से भिड़ना है। इसे गुरिल्ला वॉर करना है। कॉलेज में वर्चस्व जमा बैठे लोगों के कोठे पर धमाका करना है। हिला देना है सिंहासन। रणविजय सिंह जो जब बोलता तो ऐसा लगता मानो सामने वाले की जुबान से बातें खिंचवाना चाह रहा हो। और बाद में डंके की चोट पर वक़्त आने पर उन्हें जवाब देना है। लेकिन इस बार अपनी जुबान से। इसे हिसाब पूरा करने में भरोसा है! 


यहां से बदल गई पूरी कहानी। इरफ़ान खान जो अब तक सिर्फ रणविजय सिंह बना था। उसके पान सिंह तोमर और रूहदार बनने की सीढियां तैयार हो चुकी थीं। लेकिन सफर में अभी और भी पत्थर गाड़ने बाकी थे। साल 2006। नौवीं में था मैं। फिल्म आई द 'किलर'। मैंने देखा नहीं। लेकिन टीवी पर कहीं न कहीं आते ट्रेलर जरूर देखा था। और कहीं किसी अखबार में पोस्टर दिखा था। जिसमें छोटे काले कपड़ों में दिख रही थी एक लड़की। और पीछे कोने में दो आदमी।

जिनमें से मैं सिर्फ एक को जानता था। इमरान हाशमी। जिसकी फिल्मों के गाने जबरदस्त होते हैं। नहीं पहचानता था तो उस आदमी को। जिसकी फिल्मों का बाद में दीवाना हो गया। बाद में जब फिल्म देखी तो इस फिल्म का वो सीन कभी नहीं भूला। जब विक्रम, छिपे हुए निखिल को सामने आने के लिए ललकारता नहीं है। बल्कि गाने गाता है। चेहरे पर मुस्कान। बेकग्राउंड में म्युज़िक डरा देने वाले। लेकिन ये चिल्ल है। सीन देख कर ही समझ आ जाता है, सामने वाला आदमी किस कदर डरा होगा।



फिर तो फिल्मों की जैसे कतार लग गई। हिट-फ्लॉफ़ का सिलसिला जारी रहता है। लेकिन इन हिट-फ्लॉफ़ से किसी को अगर कोई फर्क नहीं पड़ा था तो वो था इरफ़ान। इरफ़ान खान! बल्कि वो अब और भी निखरता चला गया। 2009 में फिल्म आई थी। बिल्लू बार्बर। बवाल हुआ नाम में से बार्बर हटाया गया फिल्म हो गई बिल्लू। फिल्म कुछ खास नहीं कर पाई। लेकिन एक आदमी याद रह गया बिल्लू। 'न्यूयॉर्क' के उस मेनिपुलेटिव एफबीआई ऑफिसर रोशन को कौन भूल सकता है। 

सच कहूं तो अगर इरफ़ान की फिल्म की चर्चा करते रहें तो ये अनंतकाल तक जाएगा। इरफ़ान के फिल्म में अप्पियर करने से लेकर, पलके गिराने-उठाने तक। किसी को तिरछी नज़र से देखने से लेकर जुबान से कोई डायलॉग बोलने तक हर एक एक्टिविटी पर किताब लिखी जा सकती है। 

इसके बाद की जो भी फिल्में हैं, चाहे वो ये साली ज़िंदगी का बदकिस्मत अरुण हो या फिर 7 खून माफ़ का वसीउल्लाह। साहेब बीवी और गैंगस्टर का इंद्रजीत सिंह उर्फ़ राजा भैया या फिर दी लंचबॉक्स का रिटायर होने वाला साजन फर्नांनडीज़। ना बातें खत्म करने का जी करता है। और न हीं ये खत्म की जा सकती हैं।



लेकिन एक और किरदार है जिसका जिक्र करना जरूरी है। आखिर में। पान सिंह तोमर। 2012 में आई सुपरहिट फिल्म। जिसके लिए इरफ़ान को नेशनल अवार्ड मिला था। बेस्ट एक्टिंग का। और फिल्मफेयर क्रिटिक अवार्ड फॉर बेस्ट एक्टिंग। 

जब पान सिंह कहता है, 'बीहड़ में बागी मिलते हैं, डकैत तो पार्लियामेंट में मिलते हैं।' तो क्या सिनेमा हॉल और क्या हॉस्टल का कमरा। हूटिंग की आवाज़ कान फाड़ देती है। जब वो रेस के मैदान पर भागता है। तो सिनेमा हॉल में बैठे लोग उंगलियां घुमाने लगते हैं। 



वीडियो: 

 

सॉफ्टी! सॉफ्टी ऐसे जीभ लपेट के बोलता हो मानो। हमारे हाथों में ला कर रखने वाला हो। कहीं किसी टीवी के 'एड' में दिख जाए तो वो एड ही शॉर्ट फिल्म लगने लगती है। ये वो चीज़ है! ये है इरफ़ान खान। जिसके एक्टिंग का सफर शुरू होता है 'जादुई एनएसडी' से और बाकी तो इतिहास है। 

आज जन्मदिन है! जन्मदिन मुबारक हो रणविजय सिंह। इस उम्मीद के साथ खत्म कर रहा हूं कि मरने से पहले एक बार तुम्हारा दीदार जरूर होगा। तुमसे हाथ जरूर मिलाऊंगा! 

 

Firkee.in असली मज़ा! 

 
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